
साफ नदी या साफ होता सरकारी खजाना?
विशेष संवाददाता, संदेश धारा-
दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना नदी की हालत सुधारने के नाम पर एक बार फिर बड़े-बड़े खर्चों का खुलासा हुआ है। छठ पूजा से पहले यमुना में जमी जहरीली झाग हटाने के लिए 66 दिनों में ₹80 लाख खर्च कर दिए गए, लेकिन नतीजा वही पुराना—नदी आज भी झाग, बदबू और ज़हर से भरी हुई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले 3 वर्षों में यमुना की सफाई पर ₹5,500 करोड़ से अधिक की रकम खर्च की जा चुकी है। सवाल यह है कि अगर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, तो फिर यमुना की तस्वीर क्यों नहीं बदली?झाग हटाने का दिखावा, जड़ पर कोई काम नहीं
हर साल सर्दियों में यमुना में झाग की मोटी परत दिखाई देती है। मशीनें लगती हैं, कैमरे चलते हैं, बयान आते हैं और कुछ हफ्तों बाद सब कुछ फिर जस का तस।
असल समस्या—औद्योगिक कचरा, बिना ट्रीट किया गया सीवर, नालों का सीधा नदी में गिरना—इन पर ठोस और स्थायी कार्रवाई आज तक नहीं हो सकी।
यमुना नहीं, बजट साफ हो रहा है?
आम लोगों के बीच अब यह चर्चा आम है कि
“यमुना तो साफ नहीं हो रही, लेकिन यमुना के नाम पर सरकारी खजाना जरूर साफ हो रहा है।”
हर सरकार, हर विभाग और हर एजेंसी यमुना सफाई के नाम पर करोड़ों का बजट लेती है, लेकिन जवाबदेही किसी की तय नहीं होती।
ज़िम्मेदार कौन?
क्या दिल्ली सरकार?
क्या केंद्र सरकार?
क्या जल बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड?
या फिर ठेकेदारों और अफसरों का गठजोड़?
सब जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल देते हैं और यमुना हर साल और ज़्यादा बीमार होती जाती है।
आस्था बनाम हकीकत
छठ पूजा जैसे पवित्र पर्व पर श्रद्धालु इसी जहरीली यमुना में उतरने को मजबूर हैं। सवाल यह भी है कि क्या यह आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं है?
निष्कर्ष
यमुना सफाई अब पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक खेल बन चुकी है। जब तक खर्च का हिसाब, काम की गुणवत्ता और जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक
यमुना नहीं बचेगी — सिर्फ़ फाइलें और आंकड़े चलते रहेंगे।
अब सवाल साफ है—
यमुना कब साफ होगी या सिर्फ बजट ही बहता रहेगा?

