
ईमानदार अफ़सर को निलंबन, खनन माफिया को खुली छूट!
नोएडा ब्यूरो।
वर्ष 2013 में जब तत्कालीन IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल ने नोएडा क्षेत्र में अवैध खनन माफियाओं पर सख़्त कार्रवाई की, तब यह साफ हो गया था कि प्रशासन चाहे तो माफिया तंत्र को रोका जा सकता है। लेकिन ईमानदारी की उस पहल की कीमत उन्हें निलंबन के रूप में चुकानी पड़ी।
तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने उन्हें उस समय निलंबित किया, जब जिला मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट उन्हें क्लीन चिट दे चुकी थी और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का कोई आधार नहीं था। यह फैसला उस दौर में राजनीतिक हस्तक्षेप और खनन माफियाओं के दबाव का प्रतीक बन गया।
कार्रवाई की सज़ा, चुप्पी का इनाम
दुर्गा नागपाल के निलंबन ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को एक संदेश दिया—
माफियाओं से टकराओगे तो सिस्टम साथ नहीं देगा।
आज भी जारी अवैध खनन
दुर्गा नागपाल के बाद नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना खादर क्षेत्र में अवैध खनन आज भी जारी है। रेत से भरे डंपर, ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ और रात के अंधेरे में होने वाला खनन प्रशासन की मौजूदगी पर सवाल खड़े करता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या अब किसी अधिकारी में माफिया के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं बची?
या फिर राजनीतिक संरक्षण में खनन माफिया अजेय बन चुका है?
काग़ज़ों में कार्रवाई, ज़मीन पर माफिया
खनन विभाग और स्थानीय प्रशासन की गतिविधियाँ आज भी नोटिस, रिपोर्ट और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत में खनन निर्बाध जारी है।
एक मिसाल, जो सिस्टम को आईना दिखाती है
दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला आज भी प्रशासनिक स्वतंत्रता बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप की बहस में मील का पत्थर है—
यह बताता है कि जब ईमानदारी को दंड और अपराध को संरक्षण मिले, तो हार केवल एक अधिकारी की नहीं, पूरे लोकतांत्रिक सिस्टम की होती है।

