
गुलफाम सैफी, संदेश धारा –
हापुड़ जनपद में कृषि विज्ञान केन्द्र बाबूगढ़ पर 05 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 16-20 दिसंबर 2025 तक किया जायेगा। कार्यक्रम के दूसरे दिन पादप सुरक्षा विशेषज्ञ एवं प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, बुलन्दशहर रेशू सिंह ने पादप सुरक्षा का फसल अवशेष प्रबंधन में क्या महत्व है पर चर्चा की।
उन्होने बताया कि पादप सुरक्षा का फसल अवशेष प्रबंधन में बहुत महत्व है क्योंकि यह मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारता है, मृदा अपरदन रोकता है, पानी के रिसाव को बढ़ाता है, मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करता है, प्रदूषण कम करता है, और पोषक तत्वों को लौटाता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है और खेती लागत कम होती है, जो टिकाऊ कृषि के लिए जरूरी है।
कृषि विज्ञान केन्द्र, बुलन्दशहर से पादप प्रजनन के विशेषज्ञ डा0 लक्ष्मीकांत सारस्वत जी ने बताया कि पादप प्रजनन का फसल अवशेष प्रबंधन में बहुत महत्व है, क्योंकि यह ऐसी किस्में विकसित करता है जो अवशेषों को जल्दी विघटित करती हैं, मिट्टी के पोषक तत्वों को बढाती हैं, सूखे व कीट-प्रतिरोधी होती हैं, जिससे अवशेषों को जलाना कम हो जाता है, प्रदूषण घटता है, और किसान को कम लागत में बेहतर उपज व मृदा स्वास्थ्य मिलता है, जो टिकाऊ कृषि के लिए जरूरी है।
केंद्र प्रभारी डॉ अरविंद कुमार ने किसानों को बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) एक ऐसी रणनीति है जो जुताई की आवृत्ति और तीव्रता को कम करने और पिछली फसलों के बचे हुए अवशेषों की मात्रा बढ़ाने पर आधारित है। इस प्रबंधन पद्धति का लक्ष्य मिट्टी और जल की गुणवत्ता का संरक्षण करते हुए कई अन्य पारिस्थितिक और आर्थिक लाभ प्रदान करना है।
उच्च पैदावार और ईंधन, बिजली, तथा सिंथेटिक कीटनाशकों और उर्वरकों जैसे महंगे निवेशों के कम उपयोग के कारण अधिकांश स्थितियों में फसल अवशेष प्रबंधन को अपनाना उचित है। मृदा विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक सिंह ने बताया कि फसल और मिट्टी का प्रकार, जलवायु और खेती के तरीके, ये सभी इस बात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि फसल अवशेष प्रबंधन पर्यावरण के लिए कितना फायदेमंद है।
कृषि प्रसार विशेषज्ञ डॉक्टर नीलम कुमारी ने फसल अवशेष प्रबंधन से संबंधित केंद्र एवं राज्य सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं के बारे में किसानों को बताया। कृषि विज्ञान केन्द्र, बुलन्दशहर के सस्य विज्ञान के विशेषज्ञ ने बताया कि सस्य विज्ञान फसल अवशेषों को कचरा मानने के बजाय एक मूल्यवान संसाधन मानता है, जिसे सही प्रबंधन तकनीकों (जैसे हैप्पी सीडर, मल्चिंग, कम्पोस्टिंग) के माध्यम से मिट्टी के स्वास्थ्य, पर्यावरण और किसान की आय में सुधार के लिए उपयोग किया जा सकता है।
केन्द्र के वैज्ञानिक डा0 पी0के0 मडके ने किसानों से कहा कि पशुपालन में फसल अवशेष (जैसे भूसा, डंठल) बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पशुओं के लिए सस्ता और सुलभ चारा प्रदान करते हैं, सूखे चारे की कमी पूरी करते हैं और पानी व उर्वरक की बचत करके लागत कम करते हैं, साथ ही इन्हें जलाने से रोककर पर्यावरण प्रदूषण (धुआं, ग्रीनहाउस गैसें) और मिट्टी के स्वास्थ्य (पोषक तत्व) में सुधार होता है। डा0 वरीेन्द्र पाल गंगवार वैज्ञानिक ने कहा कि बागवानी में फसल अवशेषों (जैसे भूसा, डंठल) का महत्व बहुत ज़्यादा है क्योंकि ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, कटाव रोकते हैं, नमी बचाते हैं, खरपतवार नियंत्रण करते हैं और जैविक पदार्थ जोड़ते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों की ज़रूरत कम होती है और मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है। कार्यक्रम में 25 कृषकों ने भाग लिया।

