
ट्रांसफर के बाद भी नहीं टूटा रसूख: 10 लाख रिश्वत लेते पकड़ा गया ASI, SHO की भूमिका पर भी उठे सवाल
विशेष संवाददाता, संदेश धारा-
नई दिल्ली। राजधानी में पुलिस महकमे की साख पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। संपत्ति विवाद के एक मामले में 10 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किए गए एक एएसआई (सहायक उप-निरीक्षक) का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। आरोप है कि ट्रांसफर के बाद भी उसका इलाके में प्रभाव कम नहीं हुआ और वह पर्दे के पीछे से खेल जारी रखे हुए था। इस पूरे प्रकरण में संबंधित थाने के एसएचओ की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं।
10 लाख की रिश्वत लेते पकड़ा गया
सूत्रों के अनुसार, एएसआई को एक संपत्ति विवाद में समझौता कराने के नाम पर 10 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए केंद्रीय एजेंसी ने गिरफ्तार किया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पहले उसे कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया गया और फिर मामले को “सेटल” कराने के नाम पर मोटी रकम की मांग की गई।
बताया जा रहा है कि आरोपी एएसआई ने पहले 10 लाख रुपये लिए और बाद में 25 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग की। रकम न देने पर फर्जी मुकदमे में फंसाने की धमकी भी दी गई थी।
ट्रांसफर के बाद भी सक्रिय
चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि गिरफ्तारी से पहले एएसआई का ट्रांसफर दूसरे थाने में हो चुका था, लेकिन इसके बावजूद वह पुराने इलाके में प्रभाव बनाए हुए था। आरोप है कि वह ग्रेटर कैलाश क्षेत्र में जाकर पक्षकारों पर दबाव बनाता रहा।
पीड़ित पक्ष का कहना है कि “ट्रांसफर सिर्फ कागजों में हुआ, जमीनी स्तर पर उसकी दखलंदाजी जारी रही।”
SHO की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में संबंधित थाने के एसएचओ की भूमिका भी चर्चा में है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि एएसआई का ट्रांसफर हो चुका था, तो वह उसी इलाके में जाकर कैसे हस्तक्षेप कर रहा था? क्या इसकी जानकारी थाने के प्रभारी को थी?
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी के किसी ट्रांसफर किए गए कर्मचारी का उसी क्षेत्र में सक्रिय रहना संभव नहीं होता। ऐसे में विभागीय जांच की मांग तेज हो गई है।
विभागीय जांच की मांग
घटना के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। उच्च अधिकारियों ने मामले की आंतरिक जांच के संकेत दिए हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर जबरन वसूली करता है, तो यह न केवल भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत अपराध है, बल्कि विभागीय आचरण नियमों का भी गंभीर उल्लंघन है।
जनता में रोष
मामले के सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश है। उनका कहना है कि जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वही यदि धन उगाही में लिप्त पाए जाएं, तो आम जनता का विश्वास कैसे कायम रहेगा?
अब सभी की नजर विभागीय जांच और आगे की कानूनी कार्रवाई पर टिकी है। यह देखना होगा कि क्या केवल एएसआई पर कार्रवाई होती है या फिर जिम्मेदारी तय कर उच्च स्तर तक जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है।

